झालावाड़: खसरा नंबर 1482 व 1483 की नॉन-कन्वर्ट जमीन पर अवैध प्लॉटिंग का मामला, सरकार को राजस्व नुकसान की आशंका

झालावाड़ शहर में आवासीय छात्रावास के पीछे स्थित खसरा नंबर 1482 व 1483 की जमीन पर कथित रूप से अवैध प्लॉटिंग कर जमीन बेचने की तैयारी का मामला सामने आया है। स्थानीय लोगों के अनुसार उक्त जमीन को पहले पूरी तरह साफ करवाया गया, इसके बाद सुनियोजित तरीके से प्लॉटिंग कर दी गई। जमीन को छोटे-छोटे प्लॉट में बांटकर जगह-जगह खूंटे गाड़ दिए गए हैं और प्लॉटों की सीमाएं भी तय कर दी गई हैं। इससे क्षेत्र में चर्चा का माहौल बना हुआ है और लोगों ने प्रशासन से मामले की जांच की मांग की है।

बताया जा रहा है कि संबंधित भूमि अभी तक नॉन-कन्वर्ट यानी कृषि भूमि के रूप में दर्ज है। इसके बावजूद यहां व्यवस्थित तरीके से कॉलोनी की तरह प्लॉटिंग की जा रही है। यदि ऐसा है तो यह राजस्थान सरकार के भूमि संबंधी नियमों का उल्लंघन माना जा सकता है।

राजस्थान में कृषि भूमि को आवासीय या व्यावसायिक उपयोग में लेने से पहले उसका भूमि उपयोग परिवर्तन करवाना अनिवार्य होता है। यह प्रक्रिया Rajasthan Land Revenue Act, 1956 की धारा 90-A के तहत की जाती है। इस धारा के अनुसार यदि कोई व्यक्ति कृषि भूमि को आवासीय या व्यावसायिक उपयोग में लेना चाहता है तो उसे पहले उपखंड अधिकारी (SDM) के समक्ष आवेदन कर भूमि का कन्वर्जन करवाना पड़ता है। इसके बाद नियमानुसार कन्वर्जन शुल्क और अन्य चार्ज जमा करवाए जाते हैं, तब ही जमीन को अन्य उपयोग के लिए मान्यता मिलती है।

जानकारों के अनुसार यदि बिना कन्वर्जन के ही जमीन को छोटे-छोटे प्लॉट में काटकर बेचा जाता है तो यह सीधे तौर पर धारा 90-A के प्रावधानों का उल्लंघन माना जाता है। ऐसी स्थिति में प्रशासन द्वारा संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।

इसके अलावा किसी भी जमीन को कॉलोनी के रूप में विकसित करने या प्लॉटिंग करने के लिए स्थानीय निकाय से लेआउट प्लान की स्वीकृति लेना भी जरूरी होता है। इसके लिए Rajasthan Urban Areas (Sub‑Division, Reconstitution and Improvement of Plots) Rules, 1975 के नियम लागू होते हैं। इन नियमों के तहत किसी भी जमीन को छोटे-छोटे प्लॉट में विभाजित करने से पहले संबंधित नगर परिषद या विकास प्राधिकरण से स्वीकृति लेना अनिवार्य होता है। बिना स्वीकृति के प्लॉटिंग कर कॉलोनी विकसित करना अवैध माना जाता है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि आवासीय छात्रावास के पीछे स्थित खसरा नंबर 1482 व 1483 की जमीन पर पहले जेसीबी और मजदूरों की मदद से सफाई करवाई गई। इसके बाद जमीन को समतल कर व्यवस्थित तरीके से प्लॉटों की प्लानिंग कर दी गई। जमीन पर कई स्थानों पर खूंटे गाड़कर प्लॉटों की सीमाएं निर्धारित कर दी गई हैं। इससे यह आशंका जताई जा रही है कि जल्द ही इन प्लॉटों की बिक्री शुरू की जा सकती है।

यदि यह जमीन नॉन-कन्वर्ट है और बिना अनुमति प्लॉटिंग की जा रही है तो इससे राज्य सरकार को राजस्व का बड़ा नुकसान भी हो सकता है। दरअसल जब किसी जमीन का कन्वर्जन कराया जाता है तो सरकार को कन्वर्जन शुल्क, विकास शुल्क और अन्य चार्ज के रूप में राजस्व प्राप्त होता है। लेकिन यदि बिना प्रक्रिया पूरी किए ही जमीन की प्लॉटिंग कर दी जाती है तो सरकार को मिलने वाला यह राजस्व नहीं मिल पाता।

राजस्व विभाग से जुड़े जानकारों का कहना है कि इस प्रकार के मामलों में प्रशासन को शिकायत मिलने पर मौके पर जांच करवाई जाती है। यदि जांच में पाया जाता है कि जमीन का कन्वर्जन नहीं हुआ है और बिना अनुमति प्लॉटिंग की जा रही है, तो संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। इसमें अवैध प्लॉटिंग को रुकवाना, प्लॉटिंग हटवाना और जुर्माना लगाने जैसी कार्रवाई भी शामिल हो सकती है।

क्षेत्र के कुछ लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि मामले की निष्पक्ष जांच करवाई जाए। उनका कहना है कि कई बार इस प्रकार की जमीन लोगों को सस्ते दामों में बेच दी जाती है, लेकिन बाद में खरीदारों को पता चलता है कि जमीन का कन्वर्जन नहीं हुआ है या कॉलोनी को प्रशासन की स्वीकृति नहीं मिली है। ऐसे में लोगों को मकान बनाने या बिजली-पानी जैसी सुविधाएं लेने में भी परेशानी का सामना करना पड़ता है।

लोगों का कहना है कि यदि समय रहते प्रशासन ने कार्रवाई नहीं की तो भविष्य में कई लोग इस तरह की जमीन खरीदकर परेशान हो सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि संबंधित विभाग मौके पर जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करे और यदि नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।

फिलहाल आवासीय छात्रावास के पीछे स्थित खसरा नंबर 1482 व 1483 की जमीन पर हो रही कथित प्लॉटिंग को लेकर क्षेत्र में चर्चा बनी हुई है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाता है और जांच के बाद वास्तविक स्थिति क्या सामने आती है। यदि नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो यह मामला न केवल कानून के उल्लंघन का होगा, बल्कि इससे सरकार को राजस्व नुकसान होने की संभावना भी जताई जा रही है।

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