
झालावाड़ जिले में पारंपरिक फसलों के साथ अब औषधीय खेती की ओर किसानों का रुझान तेजी से बढ़ रहा है। विशेष रूप से अश्वगंधा की खेती ग्रामीण क्षेत्रों में आय का नया स्रोत बनकर उभर रही है। जिले के गांव खोद के किसान पूनम पटेल और प्रहलाद मेघवाल ने बताया कि कम लागत और बेहतर बाजार मूल्य के कारण अश्वगंधा की खेती किसानों के लिए लाभकारी विकल्प साबित हो रही है।
अश्वगंधा की पैदावार और खेती का तरीका
अश्वगंधा एक महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है, जिसका उपयोग आयुर्वेदिक दवाइयों में बड़े पैमाने पर किया जाता है। इसकी पैदावार मिट्टी की उर्वरता, सिंचाई की उपलब्धता और खेत प्रबंधन पर निर्भर करती है। विशेषज्ञों के अनुसार, एक एकड़ जमीन से औसतन 400 से 500 किलोग्राम तक सूखी जड़ें और लगभग 40 से 60 किलोग्राम बीज प्राप्त हो सकते हैं।
पूनम पटेल ने बताया कि अश्वगंधा की बुवाई जुलाई-अगस्त में की जाती है और लगभग 5 से 6 माह में फसल तैयार हो जाती है। इसकी खेती के लिए हल्की दोमट या बलुई मिट्टी उपयुक्त रहती है। अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होने से यह फसल कम पानी वाले क्षेत्रों में भी आसानी से ली जा सकती है। उन्होंने बताया कि पारंपरिक फसलों की तुलना में इसमें कीट और रोग का प्रकोप भी कम रहता है, जिससे लागत घटती है।
लागत और लाभ

प्रहलाद मेघवाल के अनुसार, एक एकड़ में अश्वगंधा की खेती पर लगभग 15 से 20 हजार रुपये तक की लागत आती है, जिसमें बीज, जुताई, खाद और मजदूरी शामिल है। यदि औसतन 450 किलोग्राम जड़ें और 50 किलोग्राम बीज प्राप्त होते हैं तो वर्तमान बाजार दर के हिसाब से किसानों को अच्छा मुनाफा मिल सकता है।
सूखी जड़ें करीब 90 रुपये प्रति किलोग्राम और बीज लगभग 75 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिक रहे हैं। इस हिसाब से एक एकड़ से किसान 40 से 50 हजार रुपये तक की आय अर्जित कर सकते हैं। किसानों का कहना है कि यदि बाजार भाव अच्छा मिल जाए तो मुनाफा और अधिक हो सकता है।
अश्वगंधा का प्रमुख बाजार
अश्वगंधा के व्यापार के लिए मध्य प्रदेश के नीमच और मंदसौर देश-विदेश में प्रसिद्ध हैं। यहां हर साल बड़ी संख्या में आयातक, खरीदार, प्रोसेसर, पारंपरिक व्यापारी और आयुर्वेदिक कंपनियों के प्रतिनिधि पहुंचते हैं। ये व्यापारी अश्वगंधा की सूखी जड़ें और बीज खरीदकर देश के विभिन्न हिस्सों तथा विदेशों में आपूर्ति करते हैं।
किसानों का कहना है कि बड़े पैमाने पर उत्पादन करने से पहले बाजार की जानकारी लेना जरूरी है। हर्बल और आयुर्वेदिक कंपनियों से सीधे संपर्क स्थापित करना लाभकारी साबित हो सकता है। कई किसान समूह बनाकर सामूहिक रूप से अपनी उपज बेचने की योजना भी बना रहे हैं, ताकि उन्हें बेहतर भाव मिल सके।
औषधीय महत्व
अश्वगंधा को आयुर्वेद में अत्यंत महत्वपूर्ण जड़ी-बूटी माना जाता है। इसका उपयोग रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, तनाव कम करने और शरीर की ऊर्जा बढ़ाने वाली दवाइयों में किया जाता है। देश में आयुर्वेदिक और हर्बल उत्पादों की बढ़ती मांग के चलते अश्वगंधा की खपत में लगातार वृद्धि हो रही है। यही कारण है कि किसान इसे नकदी फसल के रूप में अपनाने लगे हैं।
सरकारी प्रोत्साहन और संभावनाएं
औषधीय खेती को बढ़ावा देने के लिए कृषि विभाग द्वारा समय-समय पर प्रशिक्षण और मार्गदर्शन दिया जाता है। यदि किसानों को बीज, तकनीकी जानकारी और विपणन सहायता मिले तो अश्वगंधा की खेती बड़े स्तर पर विकसित हो सकती है।

पूनम पटेल और प्रहलाद मेघवाल का कहना है कि यदि प्रशासन और कृषि विभाग की ओर से विपणन की बेहतर व्यवस्था हो जाए तो जिले के कई किसान पारंपरिक फसलों से हटकर औषधीय खेती की ओर रुख कर सकते हैं। इससे न केवल किसानों की आय बढ़ेगी बल्कि क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
निष्कर्ष
झालावाड़ के गांव खोद में अश्वगंधा की सफल खेती यह दर्शाती है कि सही जानकारी और बाजार से जुड़ाव होने पर किसान पारंपरिक खेती से हटकर भी बेहतर आय अर्जित कर सकते हैं। कम लागत, कम पानी और स्थिर बाजार मांग के कारण अश्वगंधा भविष्य की लाभकारी फसल बन सकती है। किसानों का मानना है कि यदि वे संगठित होकर उत्पादन और विपणन की रणनीति अपनाएं तो जिले को औषधीय खेती का प्रमुख केंद्र बनाया जा सकता है।