गिरफ्तारी पर रोक: नेहा सिंह राठौर को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, जांच में सहयोग का निर्देश

लोकप्रिय लोक गायिका और सामाजिक टिप्पणीकार नेहा सिंह राठौर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़े सोशल मीडिया पोस्ट मामले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने उनकी गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगा दी है। यह आदेश उस प्राथमिकी (एफआईआर) के संदर्भ में आया है, जिसमें उन पर पहलगाम आतंकी हमले के बाद कथित तौर पर “विवादित” और “राष्ट्र-विरोधी” पोस्ट करने के आरोप लगाए गए थे। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह राहत जांच में पूर्ण सहयोग की शर्त पर है और नेहा सिंह राठौर को जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित होना अनिवार्य होगा।

बुधवार, 7 जनवरी को मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ—न्यायमूर्ति जे.के. महेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुकर—ने उत्तर प्रदेश सरकार और शिकायतकर्ता को नोटिस जारी किया। अदालत ने आदेश दिया कि अगली सुनवाई तक नेहा सिंह राठौर के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। साथ ही, उन्हें जांच में सहयोग करने और जांच अधिकारी (IO) के समक्ष निर्धारित तिथि पर उपस्थित रहने का निर्देश दिया गया।

जांच में पेश होना अनिवार्य, 19 जनवरी की तारीख तय

कोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि राठौर को 19 जनवरी को जांच अधिकारी के सामने उपस्थित होना होगा और किसी भी प्रकार की गैर-हाजिरी को गंभीरता से लिया जाएगा। राठौर की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि उनकी मुवक्किल 3 जनवरी को पहले ही जांच अधिकारी के सामने पेश हो चुकी हैं। वहीं, राज्य सरकार की ओर से सहयोग न करने का आरोप लगाया गया, जिस पर अदालत ने रिकॉर्ड के आधार पर आगे की जांच जारी रखने का निर्देश दिया।

एफआईआर का आधार और आरोप

एफआईआर के मुताबिक, 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले में 26 पर्यटकों की मौत के बाद नेहा सिंह राठौर ने सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट किए थे। अभियोजन का दावा है कि इन पोस्ट्स का समय और भाषा ऐसी थी, जिससे राष्ट्रीय अखंडता पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता था और धर्म/जाति के आधार पर अपराध भड़कने की आशंका पैदा हुई। आरोप यह भी लगाया गया कि सरकार उस समय पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई कर रही थी और ऐसे में पोस्ट्स से देश की एकता को नुकसान पहुंचा।

लखनऊ में दर्ज हुई थी प्राथमिकी

नेहा सिंह राठौर के खिलाफ 27 अप्रैल को लखनऊ के हजरतगंज पुलिस थाना में एफआईआर दर्ज की गई थी। शिकायतकर्ता अभय प्रताप सिंह ने आरोप लगाया था कि राठौर बार-बार धार्मिक आधार पर एक समुदाय को दूसरे समुदाय के खिलाफ भड़काने का प्रयास करती रही हैं। एफआईआर में यह भी उल्लेख है कि पोस्ट्स में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम कथित रूप से आपत्तिजनक संदर्भ में इस्तेमाल किया गया।

 

 

 

 

हाई कोर्ट से नहीं मिली थी राहत

इससे पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नेहा सिंह राठौर की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी। हाई कोर्ट का कहना था कि सोशल मीडिया पोस्ट प्रधानमंत्री के खिलाफ थे और उनके नाम का अपमानजनक तरीके से प्रयोग किया गया। इसी आदेश के खिलाफ राठौर ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 19 का उल्लेख करते हुए कहा कि यह अनुच्छेद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है। यह सार्वजनिक व्यवस्था, शील और नैतिकता के हित में लगाए गए उचित प्रतिबंधों के अधीन है। अदालत ने संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया—जहां एक ओर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षण जरूरी है, वहीं दूसरी ओर कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय हित भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

अंतरिम राहत, अंतिम निर्णय शेष

सुप्रीम कोर्ट की ओर से दी गई राहत अंतरिम है। इसका अर्थ यह है कि नेहा सिंह राठौर फिलहाल गिरफ्तारी से सुरक्षित हैं, लेकिन जांच प्रक्रिया जारी रहेगी और उन्हें जांच अधिकारी के समक्ष नियमित रूप से पेश होना होगा। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि यदि जांच में असहयोग पाया गया, तो अंतरिम संरक्षण पर पुनर्विचार किया जा सकता है।

राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं

इस आदेश के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। समर्थकों का कहना है कि यह फैसला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण है, जबकि आलोचकों का तर्क है कि संवेदनशील समय में जिम्मेदाराना वक्तव्य आवश्यक हैं। सोशल मीडिया पर भी इस मामले को लेकर तीखी बहस देखने को मिल रही है।

आगे क्या?

अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। अगली सुनवाई में अदालत जांच की प्रगति, राठौर के सहयोग और राज्य सरकार के रुख की समीक्षा करेगी। फिलहाल, नेहा सिंह राठौर को गिरफ्तारी से राहत है, लेकिन उन्हें जांच में पूरी तरह सहयोग करना होगा। इस प्रकरण का अंतिम निर्णय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन की कसौटी पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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