
असनावर (झालावाड़)।
असनावर उपखंड क्षेत्र स्थित राजकीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) पर सोमवार को उस समय एक भावुक और चौंकाने वाला दृश्य देखने को मिला, जब यहां कार्यरत नर्सिंग कर्मियों ने अपनी मांगों को लेकर अनोखे तरीके से विरोध दर्ज कराया। नर्सिंग कर्मियों ने चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री तथा राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नाम अपने खून से पत्र और अंतर्देशीय कार्ड लिखकर सरकार का ध्यान अपनी समस्याओं की ओर आकर्षित करने का प्रयास किया।
नर्सिंग कर्मियों का कहना है कि वे वर्षों से स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ बने हुए हैं। कोरोना काल जैसे कठिन और भयावह दौर में भी उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर लगातार सेवाएं दीं। उस समय न तो संसाधनों की पर्याप्त उपलब्धता थी और न ही सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम, इसके बावजूद नर्सिंग स्टाफ ने मरीजों की सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ी। कई कर्मी स्वयं संक्रमित हुए, कई ने अपने परिवार से दूरी बनाकर काम किया, लेकिन आज तक उनके योगदान के अनुरूप उन्हें न तो सम्मान मिला और न ही स्थायी समाधान।
बोनस और नियमित भर्ती की प्रमुख मांग
नर्सिंग कर्मियों की प्रमुख मांग है कि सरकार उन्हें 20 से 30 अंकों का बोनस प्रदान करे, ताकि वे नियमित भर्ती प्रक्रिया में पात्रता हासिल कर सकें। उनका कहना है कि वर्षों से नियमित नर्सिंग भर्ती नहीं निकल रही है, जिससे संविदा और अस्थायी तौर पर काम कर रहे कर्मियों का भविष्य अधर में लटका हुआ है। लंबे समय से सेवा देने के बावजूद स्थायित्व न मिलना उनके मनोबल को तोड़ रहा है।
कर्मियों ने बताया कि बढ़ती महंगाई के इस दौर में सीमित वेतन में परिवार चलाना बेहद मुश्किल हो गया है। बच्चों की पढ़ाई, मकान किराया, इलाज और रोजमर्रा के खर्चों के बीच आर्थिक दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। इसके बावजूद सरकार की ओर से न तो भर्ती की ठोस घोषणा की जा रही है और न ही किसी प्रकार की राहत दी जा रही है।
खून से लिखा पत्र बना विरोध का प्रतीक
नर्सिंग कर्मियों ने कहा कि उन्होंने खून से पत्र लिखने जैसा कठोर कदम मजबूरी में उठाया है। यह विरोध किसी सनसनी के लिए नहीं, बल्कि सरकार तक अपनी पीड़ा पहुंचाने का अंतिम प्रयास है। कर्मियों का कहना है कि वे कई बार ज्ञापन दे चुके हैं, शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर चुके हैं, लेकिन हर बार आश्वासन के सिवाय कुछ नहीं मिला। इसी कारण अब उन्होंने यह भावनात्मक और प्रतीकात्मक तरीका अपनाया है, ताकि शासन-प्रशासन उनकी आवाज को गंभीरता से सुने।
“हमने जान जोखिम में डाली, अब भविष्य सुरक्षित चाहिए”
प्रदर्शन कर रहे नर्सिंग कर्मियों ने एक स्वर में कहा कि कोरोना काल में जब लोग अस्पताल आने से डरते थे, तब भी वे ड्यूटी पर मौजूद रहे। दिन-रात मरीजों की सेवा की, कई बार बिना छुट्टी के लगातार काम किया। उस समय सरकार और समाज ने उन्हें “कोरोना वॉरियर्स” कहा, लेकिन आज वही वॉरियर्स अपने हक के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं।
उनका कहना है कि अगर सरकार वास्तव में स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करना चाहती है, तो सबसे पहले नर्सिंग स्टाफ को स्थायित्व और सम्मान देना होगा। बिना नियमित भर्ती और पर्याप्त प्रोत्साहन के स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता बनाए रखना संभव नहीं है।
उग्र आंदोलन की चेतावनी
नर्सिंग कर्मियों ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर शीघ्र सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया, तो वे उग्र आंदोलन करने को मजबूर होंगे। इसकी जिम्मेदारी पूरी तरह सरकार और प्रशासन की होगी। उन्होंने कहा कि आंदोलन का स्वरूप आगे और व्यापक हो सकता है, जिसमें जिले के अन्य स्वास्थ्य केंद्रों के नर्सिंग कर्मी भी शामिल होंगे।
प्रशासन और सरकार से उम्मीद
हालांकि नर्सिंग कर्मियों ने यह भी कहा कि उन्हें अब भी सरकार से उम्मीद है कि वह उनके योगदान और समस्याओं को समझेगी। यदि समय रहते 20 से 30 अंकों के बोनस की घोषणा की जाती है और नियमित नर्सिंग भर्ती प्रक्रिया शुरू की जाती है, तो यह न केवल नर्सिंग कर्मियों के लिए राहत होगी, बल्कि राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।
असनावर के राजकीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर हुआ यह अनोखा विरोध प्रदर्शन फिलहाल पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। अब देखना यह है कि सरकार इस भावनात्मक और गंभीर संदेश को कितनी संवेदनशीलता से लेती है और नर्सिंग कर्मियों की वर्षों पुरानी मांगों पर कब तक ठोस निर्णय लेती है।